Ekhetibari
Farmer's supporter
लीची

लीची के प्रमुख हानिकारक कीटों और रोगों की पहचान एवं प्रबंधन

लीची वृक्ष में विभिन्न प्रकार के कीटों एवं रोगों का प्रकोप होता है जिससे उत्पादन एवं गुणवत्ता प्रभावित होती है। अतः लीची के पौधों से अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए नाशीकीटों एवं रोगों का समय पर प्रबंधन जरूरी है। समेकित नाशीजीव प्रबंधन को अपनाकर लीची उत्पादक अपनी फसल को इन सभी कीटों एवं रोगों से होने वाली आर्थिक हानि से बचा सकते हैं। लीची में लगने वाले प्रमुख कीट एवं रोग का विवरण एवं प्रबंधन नीचे दिया गया है |

लीची

लीची के प्रमुख हानिकारक कीटों और रोगों की पहचान एवं प्रबंधन

प्रमुख कीट एवं उनका प्रबंधन

  • फल एवं टहनी बेधक (फ्रूट एवं शूट बोरर): कोनोपोमोरफा साइनेन्सिस
  • लक्षणः ये लीची की सबसे अधिक हानिकारक कीट है जो व्यापक और बहुभक्षी है। एक साल में इस कीट की कई पीढ़ियाँ होती हैं परन्तु फलन के समय की दो पीढ़ी अत्यधिक महत्वपूर्ण होती हैं। पहली पीढ़ी में जब लीची के फल लौंग दाने के आकार के होते हैं (अप्रैल प्रथम सप्ताह) तब मादा कीट पुष्पवृंत के डंठलों पर अंडे देती है जिनसे दो-तीन दिन में पिल्लू (लार्वा) निकलकर विकसित हो रहे फलों में प्रवेश कर बीजों को खाते हैं, जिसके कारण फल बाद में गिर जाते हैं। अगर ऐसे फलों को गौर से देखा जाए तो फलों पर छिद्र दिखाई देते दूसरी पीढ़ी फल परिपक्व होने के 15-20 दिन पहले (मई प्रथम सप्ताह) होती है जब इसके पिल्लू डंठल के पास से फलों में प्रवेश एवं फल के बीज और छिलके को खाकर हानि पहुँचाते हैं। पिल्लू लीची के गूदे के रंग के होते हैं। ये अपनी विष्ठा फल के अंदर जमा करते हैं जो ग्रसित फलों में डंठल के पास छिलने से दिखाई पड़ते हैं।

फल विकास के विभिन्न अवस्थाओं पर फल बेधक कीट का प्रकोपप्रबंधनः

फल लगने से पहलेः पुष्पन के समय (मंजर निकलने पर फूल खिलने से पहले) नीम बीज अर्क या नीम तेल (4 मिली/लीटर या निम्बीसीडीन 0.5% या निम्बिन 4 मिली/लीटर) पानी के घोल या वर्मीवाश 5% के छिड़काव करने से मादा कीट अण्डे नहीं दे पाती है।

  • फल लगने के बादः प्रथम कीटनाशी छिड़काव- फल लगने के 10 दिन बाद अर्थात फल के लौंग आकार की अवस्था होने पर अंतरग्राही (सिस्टेमिक) कीटनाशी थियाक्लोप्रिड 21.7 एस.सी. (0.5-0.7 मिली/लीटर) या नोवाल्यूरान 10 ई.सी. (1.5 मिली/लीटर) या लुफेन्यूरान 5.4 ई.सी. (0.6 मिली/लीटर) पानी के घोल का छिड़काव करें। दूसरा छिड़काव (सामान्य मौसम की दशा में)— संभावित फल तुड़ाई के लगभग 15 दिन पूर्व नोवाल्यूरान 10 ई.सी. (1.5 मिली/लीटर) या इमामेक्टिन बेन्जोएट 5 प्रतिशत एस.जी. (0.8 ग्राम/लीटर पानी) या लेम्डा-सायहेलोथ्रिन 5 प्रतिशत ई.सी. (1.0 मिली/लीटर पानी) या फ्लुबेंडियामाइड 39.35% एससी (1.5 मिली/5 लीटर पानी) या स्पाइनोसैड 45% एससी (1.6 मिली/5 लीटर पानी) के घोल का छिड़काव करें।
  • एहतियात/ सजगताः बदलते मौसम की दशा में (असमय वर्षा, फल तैयार होने के समय पूर्वा हवा का बहना या वातावरण में आर्द्रता की अधिकता होने पर) फलों को फल बेधक कीट से बचाव हेतु एक अतिरिक्त छिड़काव ऊपर्लिखित पहले और दूसरे छिड़काव के बीच करने की आवश्यकता होगी। ऐसी अवस्था में दूसरा छिड़काव फलों की संभावित फल तुड़ाई के 18-20 दिन पहले अंतरग्राही (सिस्टेमिक) कीटनाशी रसायन थियाक्लोप्रिड 21.7 एस.सी. (0.5-0.7 मिली. /लीटर) और तीसरा छिड़काव फल तुड़ाई के 10 दिन पहले नोवाल्यूरान 10 ई.सी. (1. 5 मिली/लीटर) या इमामेक्टिन बेन्जोएट 5 प्रतिशत एस.जी. (0.8 ग्राम/लीटर पानी) या लेम्डा-साईहेलोथ्रिन 5 प्रतिशत ई.सी. (1.0 मिली/लीटर पानी) या स्पाइनोसाड 45% एससी (1.6 मिली/5 लीटर पानी) करनी होगी।
    ध्यान रखें: कीटनाशी के घोल में पत्तियों पर रसायन को चिपकाने वाले द्रव्य स्टीकर का इस्तेमाल 0.4 मिली/लीटर की दर से करें। इससे कीटनाशी रसायन का असर ज्यादा होता है एवं वर्षा के दिनों में अगर 4 घंटे तक भी वातावरण खुला रहा तो छिड़काव असरदार साबित होता है। इसकी अनुपलब्धता हो तो बदले में कोई भी डिटर्जेंट पाउडर एक चम्मच प्रति 15 लीटर घोल में अवश्य डालें।
  • लीची मकड़ी (माइट): एसेरिया लीची
    लक्षणः लीची मकड़ी का अधिकतम प्रकोप जुलाई-अक्टूबर और फरवरी-मार्च के दौरान देखी जाती है, विशेषकर जिस बाग में हर वर्ष नियमित कटाई-छंटाई की क्रिया न की जाती हो या खराब प्रबंधित बाग में। लीची मकड़ी अत्यंत सूक्ष्म होती है जिनके शरीर बेलनाकार सफेद और चमकीले रंग के होते हैं। ये अष्टपदी यानी चार जोड़ी पैर वाले जीव होते हैं। इनके नवजात और वयस्क दोनों कोमल पत्तियों की निचली सतह, टहनी एवं पुष्पवृंत से चिपक कर लगातार रस चूसते रहते हैं। ग्रसित पत्तियाँ उत्तेजित हो जाती हैं और मोटी एवं लेदरी होकर सिकुड़ जाती है। निचली सतह पर मखमली रूआंसा (इरिनियम) निकल आता है जो बाद में भूरे या गहरे भूरे-लाल रंग का हो जाता हैं। प्रभावित टहनियों में पुष्पन एवं फलन नहीं या कम होता है।

लीची मकड़ी प्रभावित नई पत्तियाँ और मुलायम टहनी,
मकड़ी प्रभावित प्रौढ़ पत्तियों की निचली सतह, एवं अत्यधिक प्रभावित पत्तियाँ और फल

प्रबंधनः फल की तुड़ाई के बाद, नये फ्लश के उद्भव से पहले संक्रमित टहनियाँ/ अंकुरों को काटकर निकाल दें और नष्ट कर दें। इसके बाद जुलाई-अगस्त माह के दौरान क्लोरफेनेपायर 10 ई.सी. (3.0 मिली/ली. पानी) या प्रोपरगाइट 57 ईसी (3.0 मिली/ली. पानी) का एक छिड़काव करें। फिर अक्टूबर माह के दौरान नव संक्रमित टहनियों की छंटाई करें और क्लोरफेनेपायर 10 ई.सी. (3.0 मिली/ली. पानी) या प्रोपरगाइट 57 ई.सी. (3.0 मिली/ली. पानी) का एक छिड़काव करें। आवश्यकतानुसार, अगर लीची मकड़ी का प्रकोप मंजर निकलने के बाद पर फूल खिलने से पहले फरवरी माह में दृष्टिगोचर हो तो उपर्लिखित मकड़ीनाशक रसायन का एक छिड़काव करें ।

प्रमुख रोग और उनका प्रबंधन

पत्ती, मंजर एवं फल झुलसा रोगः अल्टरनेरिया अल्टरनाटा
लक्षणः यह नर्सरी में लीची के पौधों का एक प्रमुख रोग है, जो बागों के वृक्ष में मंजर (पैनिकल) एवं विकासशील फलों को भी झुलसा देते हैं। इस रोग के प्रारंभिक लक्षण पत्तियों के अंतिम सिरे पर उत्तकों के सूखने (उत्तकक्षय या नेक्रोसिस) के रूप में होती है। आमतौर पर ऐसे लक्षण को देखकर पोटैशियम की कमी का भ्रम होता है। बाद में पत्तियाँ सिरे से दोनों हाशिये की ओर सूखने लगती है। धीरे-धीरे संक्रमित पत्तियाँ चॉकलेटी गहरे-भूरे रंग की झुलसी हुई प्रतित होती है। बागों के फलन योग्य वृक्षों में रोग के लक्षण पुष्पण एवं फलन की अवस्था में दिखाई देते हैं। इसके रोगकारक मंजरों को झुलसा देते हैं जिससे प्रभावित मंजरों में कोई फल नहीं लग पाते। ऐसे मंजर देखने में सूर्य-किरणों सेजली हुई प्रतीत होती है। अगर मौसम अनुकूल नहीं रहा और मंजर की अवस्था रोग से बच गई तो बाद में अनुकूल मौसम होनेपर फल भी झुलस जाते है। तुड़ाई उपरांत भी इसके रोगजनक फल सड़न पैदा करने में प्रमुख कारक होते हैं। वृक्ष के क्षत्रक की निचली पत्तियों पर इसके रोगजनक सालों भर पलते है। रोग का फैलाव पूरी तरह मौसम (तापक्रम 30-34° सेल्सियस, 60-70 प्रतिशत आर्द्रता) पर निर्भर करता है ।

नर्सरी पौधों की पत्तियों में पत्ती झुलसा रोग, मंजर झुलसा रोग के लक्षण, एवं फल झुलसा रोग के लक्षण

प्रबंधनः प्रभावित पत्तियों को समय-समय पर इकट्ठा कर जला दें । पत्ती झुलसा से बचाव के लिए नर्सरी पौधों पर ताम्रयुक्त फफूँदनाशी, कॉपर ऑक्सीक्लोराइड या कार्बेडाजिम 50 डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम/लीटर पानी की दर से छिड़काव करें । मंजर एवं फलों को झुलसा रोग से बचाने के लिए थायोफेनेट मिथाइल 70 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम/लीटर या डाईफेनोकोनाजोल 25 प्रतिशत ई.सी. 1 मिली/लीटर या ऐजॉक्सीस्ट्रॉबिन 23 प्रतिशत एस.सी. 1 मिली/लीटर या ऐजॉक्सीस्ट्रॉबिन 18.2 प्रतिशत + डाईफेनोकोनाजोल 11.4 प्रतिशत ई.सी. संयोजित उत्पाद 1 मिली/लीटर का पहला छिड़काव मंजर निकलने के बाद परन्तु फूल खिलने से पहले, दूसरा छिड़काव फल लगने के और तीसरा छिडकाव फल तडाई से लगभग 20 दिन पहले करें।

ekhetibari,logo

कृषि के विषय में जानकारी के लिए ई खेतीबारी notification को allow करें , साथ ही साथ ekhetibari के साथ जुड़े रहने के लिए सोशल मीडिया पे फॉलो करें । अगर आप भी लीची की खेती करते हो तो अपना फोटो लीची के पौधे के साथ भेजे आपका फोटो E KHETIBARI पर पोस्ट किया जाएगा । WhatsApp No. +917004275225

Facebook Instagram YouTube LinkedIn

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *