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फरवरी से अप्रैल माह मे करे Mung ki kheti होगा बहुत मुनाफा

फरवरी से अप्रैल माह मे करे Mung ki kheti होगा बहुत मुनाफा: दुनिया मे सबसे ज्यादा मूंग की खेती Mung ki kheti भारत मे होती है तथा भारतबर्ष मे भी मूंग खासकर राजस्थान, महाराष्ट्रा , ओडिसा, उत्तर प्रदेश , आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, गुजरात और तमिलनाडु में होती है। गर्मी के मौसम मे मूंग बिहार के लिए प्रकृति का दिया हुआ एक अनोखा दलहनी फसल है। बिहार मे अगर मूंग की खेती को देखे तो लगभग 80% से ज्यादा मूंग की खेती शिरफ गर्मी के मौसम मे होती है। मूंग अपने वृद्धाकाल सबसे ज्यादा गर्मी सहन कर सजता है तथा गहूँ, मक्का , राई – सरसो, मटर, चना, आलू आदि फसलों के बाद भली- भाँति पैदा किया जा सकता है। वाताकालीन गन्ना, सूर्यमुखी, आलू के साथ अंतरवर्ती फसल के रूप मे लगाया जा सकता है।

mung ki kheti

गर्मी के मौसम मे करें Mung ki kheti होगा बहुत मुनाफा

गर्मी मे मूंग की खेती से ना सिर्फ बिहार में धान – गेंहू फसल प्रणाली मे तीसरे फसल के रूप मे क्षेत्रफल को बढ़ सकते है बल्कि उत्पादन उत्पादकता और मिट्टी की उर्वरकता को भी बढ़ सकते है। मूंग की खेती से किसान कम लागत मे अधिक मुनाफा कमा सकता है। मूंग का उपयोग दल के अलावा बिभिन्न व्यंजनों मेके रूप मे लिया जाता है। इसके पोशाक गुने करण इसे पौष्टिक आहार के रूप मे भी लिया जाता है। जिससे इसकी मांग और बाजार दोनों बना जुआ है।

मूंग की खेती करने से पहले किन किन बातों का ध्यान रखना चाहियें ?

  • जलवायु और मौसम
  • मिट्टी
  • खेत की तैयारी
  • मूंग के उन्नत प्रभेद
  • बीजारोपन
  • बुआई की विधि एवं दूरी ।
  • उरवारक का उपयोग
  • खरपतवार प्रबंधन
  • सिंचाई का सही समय

जलवायु और मौसम: गर्मी व उष्ण जलवायु मूंग के फसल के लिए बेहतर मना जाता है। दलहनी फसलों मे मूंग सबसे ज्यादा सुख बर्दास्त करने वाला फसल है। अतः बिहार मे ग्रीष्मकालीन मौसम मे मूंग की सफलतापूर्वक खेती होती है।

मिट्टी: मूंग की खेती हल्की ( बलुई -दोमट ) से भारी केवाल मिट्टी पर की जा सकती है तथा लवाणीय, क्षारीय मिट्टी मूंग की खेती के लिए उपयुक्त नहीं है। जल जमाव मूंग की खेती के लिए अतिसंवेदनशील है।

खेत की तैयारी: मूंग की खेती के लिए बुयाई से पूर्व खेत की सिंचाई करे तथा जुटाई योग्य भूमि की अवस्था हो जाने पर दो-तीन बार खेतों की जुटाई करें। प्रत्येक जुटाई के बाद खेतों को पाटा लगाकर समतल कर लें। गर्मी मे खेती की नमी को बनाए रखने के लिए खेत को पाटा लगाना आवश्यक है। जूताई के समय गोबर के खाद 5 टन प्रति हेक्टर की दर से खेत मे मिला देना चाहिए।

मूंग के उन्नत बीज

उन्नत बीज बोने का समय पकने की अवधि औषत उपज (कु०/ हे०)

एच०यू०एम०-16 15 फरवरी से 15 मार्च 65 से 70 दिन 15-16

पी०एस०-16 01 से 31 मार्च 70 से 75 दिन 10-12

पूसा विशाल 10 से 31 मार्च 70 से 75 दिन 15-18

सम्राट 15 मार्च से 10 अप्रैल 60 से 65 दिन 12-15

सोना 15 मार्च से 10 अप्रैल 60 से 65 दिन 09-10

एस०एम०एल०-668 15 मार्च से 10 अप्रैल 65 से 70 दिन 15-20

आई०पी०एम० 2-3 15 मार्च से 10 अप्रैल 55 से 60 दिन 12-14

आई०पी०एम० 205-7 15 मार्च से 10 अप्रैल 55 से 60 दिन 12-14

बीज दर: 25 – 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर

बीजारोपन: बुआई के 24 घंटे पूर्व 2 से 2.5 ग्राम फफूँदनशी ( थिरम व कैप्टान ) / कार्बोडाजिम 50 % WP प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें। बुआई के ठीक पहले फफूँदिनाशक रसायन से उपचारित बीजों को उपयुक्त राइजोबियम कल्चर एवं पी०एस०बी० से उपचारित कर बुआई करें।

बुआई की विधि एवं दूरी: बुआई बीज बुआई मशीन या शून्य जुताई मशीन से 30 x 10 से०मी० की दूरी पर करना बेहतर होता है।

उर्वरक का उपयोग: 20 किलो ग्राम नाइट्रोजन तथा 40 किलो ग्राम फास्फोरस 20 किलो ग्राम पोटाश 25 किलो ग्राम गंधक एवम् 5 किलो ग्राम जिंक प्रति हैक्टेयर की आवश्कता होती है। उर्वरक की पूरी मात्र बुआई से पूर्व अंतिम जुताई के समय समान रूप से खेत मे मिला दे।

ये भी पढे: एक एकड़ खेत मे कितना यूरिया डालना चाहिए ?

खरपतवार प्रबंधन: बुआई से २५ से ३० दिन बात निकौनी करें। रासायनिनक विधि द्वारा 300 मिली प्रति एकड़ इमाजाथाईपर 10 प्रतिशत एसएल की दर से बुआई के 15-20 दिनों बाद पानी में घोलकर खेत में छिडक़ाव करें।

मूंग की फसल मे सिंचाई: फली लगने के प्रारम्भिक अवस्था मे सिंचाई करना लाभदयक है।

मूंग मे लगने वाले कीट एवं रोग :

  1. भुआ पिल्लू
  2. तना मक्खी
  3. जैसीड
  4. येलो भेन मोजैक

भुआ पिल्लू : इसके वयस्क कीट चमकीले रंग के तितली होते है। मादा कीट गुच्छे मे पत्तियों पर अंडे से पिल्लू निकलकर झुंड मे पत्ती की हरीतिमा को खाता है। जिसके करण पत्ती मे केवल जाली नजर आता है।

उपाय:

  1. डायमेथोएट 30 ई०सी० का 2 मि०ली० प्रति ३ लीटर पानी मे मिलाकर छिड़काव करें।
  2. मालाथियोन 5 प्रतिशत धूल का 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव करें।

तना मक्खी : वयस्क कीट काले रंग के चमकीले होते है। शिशु सफेद एवं पैर रहित होते है। इसके शिशु पत्तियों मे छेद करें के साथ ताने मे भी छेद करती है और उसके मुलायम भाग को खाती है, जिसके करण पत्तियां एवं ताने सुख जाते है और अंत मे पौधे मार जाते है।

उपाय:

  1. खेत की ग्रीष्म कालीन गहरी जुताई करें ।
  2. इमिडाक्लोप्रीड 17.8 एस०एल० का 1 मिलीलीटर प्रति 3 लीटर पानी अथवा मालाथियान 50 ई०सी० का 1.5 मिली लीटर प्रति लीटर पानी मे घोलकर छिड़काव करें।

जैसीड: कीट हरे रंग के होते है वयस्क एवं शिशु कीट पत्तियां , मुलायम टहनीयों एवं फलियों से रस चूसकर क्षति पहुचते है। यह कीट विषाणु जनित रोगों के वाहक भी होते है। इस कीट को खास पहचानना यह है की पत्तियों पर तिरछा चलती है।

ऊपय:

  1. खेत को खरपतवार से मुक्त रखे।
  2. इस कीट के उपाय के इमिडाक्लोप्रीड 17.8 एस०एल० का 1 मिलीलीटरप्रति 3 लीटर पानी या मिथाइल आक्सीडेमेटान 25 ई०सी० का 1 मिली लीटर प्रति लीटर पानी मे घोलकर बनकर आक्रांत पौधे पे छिड़काव करें।

येलो भेन मोजैक: यह विषाणु द्वारा फैलाए जाने वाला रोज है, जिसके वाहक जैसीड एवं सफेद मक्खी होते है। इस रोग से प्रभावित पौधे की पत्तियां पीली होकर छोटी तथा ताने ऐठ जाते है तथा बढ़ोतरि मे बहुत कमी हो जाती है।

उपाय:

  1. रोग ग्रसित पौधे को उखाड़ कर जला दे अथवा जमीन मे अंदर गाड़ दें।
  2. इस कीट के उपाय के इमिडाक्लोप्रीड 17.8 एस०एल० का 1 मिलीलीटर प्रति 3 लीटर पानी अथवा आक्सीडेमेटान 25 ई०सी० का 1 मिली लीटर प्रति लीटर पानी मे घोलकर बनकर आक्रांत पौधे पे छिड़काव करें।

कटनी दौनी एवं भंडारण : मूंग की फलियाँ एक साथ पककर तैयार नहीं होती है । पकीं हुई फलियों को तुरई 2 से 3 बार करें। फलियों को धूप मे अछि तरह सुखाकर दौनि करें। दानों को धूप मे शुखकर भंडारित करे।

मूंग का अधिक उत्पादन लेने के लिए क्या करें?

  • स्वस्थ और प्रमाणित बीज का उपयोग करें।
  • सही समय पर बुवाई करें, देर से बुवाई करने पर पैदावार कम हो जाती है।
  • किस्मों का चयन क्षेत्रीय अनुकूलता के अनुसार करें।
  • बीज उपचार अवश्य करें जिससे पौधो को बीज और मिटटी जनित बीमारियों से प्रारंभिक अवस्था में प्रभावित होने से बचाया जा सके।
  • मिट्टी परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरक उपयोग करे जिससे भूमि की उर्वराशक्ति बनी रहती है, जो अधिक उत्पादन के लिए जरूरी है।
  • खरीफ मौसम में मेड नाली पद्धति से बुवाई करें
  • समय पर खरपतवारों नियंत्रण और कीट और रोग रोकथाम करें।
  • पीला मोजेक रोग रोधी किस्मों का चुनाव क्षेत्र की अनुकूलता के अनुसार करें।
  • पौध संरक्षण के लिये एकीकृत पौध संरक्षण के उपायों को अपनाना चाहिए।
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